शान फिल्म रिव्यू: अमिताभ–शशि की जोड़ी, शाकाल का खौफ और यादगार संगीत
कुछ फिल्मों को उनकी कहानी के साथ उनके किरदार, गाने और भव्य दृश्य भी यादगार बनाते हैं। ‘शान’ इसी तरह की फिल्म है। इसमें नायकों की मस्ती है, परिवार से जुड़ा दर्द है, बदले की आग है और एक ऐसा खलनायक है जिसकी मौजूदगी पूरे माहौल को बदल देती है।
12 दिसंबर 1980 को रिलीज हुई इस फिल्म का निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था। जी. पी. सिप्पी इसके निर्माता और सलीम–जावेद इसके लेखक थे। अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, सुनील दत्त, राखी, परवीन बाबी और बिंदिया गोस्वामी जैसे कलाकारों ने इसकी बड़ी स्टारकास्ट को आकार दिया।
‘शान फिल्म रिव्यू’ की सबसे दिलचस्प बात उसका अंदाज़ है। फिल्म दर्शक को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ सड़क की ठगी से शुरू हुई कहानी आधुनिक मशीनों और खतरनाक जालों वाले खलनायक के अड्डे तक पहुँचती है।
शान की कहानी क्या है?
विजय और रवि दो ऐसे भाई हैं जो अपनी बुद्धि और चालाकी का इस्तेमाल ठगी में करते हैं। दूसरी ओर उनके बड़े भाई शिव कुमार एक ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं। शिव का जीवन कानून और जिम्मेदारी पर टिका है, जबकि छोटे भाई आसान रास्तों से पैसा कमाना चाहते हैं।
शिव की हत्या के बाद कहानी गंभीर मोड़ लेती है। विजय और रवि का सामना शाकाल नाम के शक्तिशाली अपराधी से होता है। इस संघर्ष में राकेश भी उनके साथ जुड़ता है। शाकाल के सुरक्षित ठिकाने तक पहुँचना और उसके अपराधों का जवाब देना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
यहाँ कहानी का आकर्षण सिर्फ बदला नहीं, बल्कि किरदारों का बदलना भी है। शुरुआत में अपने फायदे के बारे में सोचने वाले लोग जब परिवार और अन्याय का सामना करते हैं, तो उनके फैसलों की गंभीरता बढ़ जाती है।
अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की जोड़ी
अमिताभ बच्चन का विजय आत्मविश्वास, शरारत और गंभीरता का मेल है। हल्के दृश्यों में उनकी सहजता फिल्म को मनोरंजक बनाती है। कहानी का भावनात्मक ताप बढ़ने पर उनके व्यक्तित्व का सख्त पक्ष सामने आता है।
शशि कपूर का रवि इस जोड़ी में गर्मजोशी और चंचलता लाता है। उनका आकर्षण केवल संवादों में नहीं, प्रतिक्रियाओं और चेहरे के भावों में भी दिखता है। दोनों अभिनेताओं के बीच तालमेल फिल्म के शुरुआती हिस्से को संभालता है।
इस जोड़ी की खूबी यह है कि दोनों एक जैसे दिखाई देने की कोशिश नहीं करते। विजय का अंदाज़ अपेक्षाकृत तीखा है और रवि की मौजूदगी में हल्कापन है। यही फर्क उनके साथ वाले दृश्यों को दिलचस्प बनाता है।
शाकाल: फिल्म का सबसे प्रभावशाली किरदार
कुलभूषण खरबंदा का शाकाल ‘शान’ का सबसे मजबूत आकर्षण है। उसके व्यक्तित्व में एक ठंडी क्रूरता है। वह हर समय चिल्लाकर अपना दबदबा साबित नहीं करता; उसका शांत व्यवहार ही बेचैनी पैदा करता है।
शाकाल की ताकत उसके अड्डे की बनावट से भी महसूस होती है। निगरानी के उपकरण, मशीनों से नियंत्रित व्यवस्थाएँ और छिपे खतरे उसे एक साधारण अपराधी से अलग पहचान देते हैं। फिल्म में उसका द्वीपीय ठिकाना कहानी के रोमांच का अहम हिस्सा है।
अभिनय की दृष्टि से खरबंदा का संयम असरदार है। उनके सामने नायक की चुनौती केवल लड़ाई जीतना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था को भेदना है जिसमें खलनायक लगभग हर चीज पर नियंत्रण रखता है।
बाकी कलाकारों का योगदान
सुनील दत्त का शिव कुमार फिल्म को नैतिक और भावनात्मक आधार देता है। उनका किरदार समझाता है कि ईमानदारी की कीमत क्या हो सकती है। उनकी मौजूदगी के कारण बाद में आने वाला संघर्ष निजी महत्व हासिल करता है।
शत्रुघ्न सिन्हा का राकेश अपने ठहराव और गंभीर व्यक्तित्व से अलग प्रभाव छोड़ता है। राखी भावनात्मक दृश्यों में गरिमा लाती हैं। परवीन बाबी और बिंदिया गोस्वामी फिल्म के हल्के, रोमांटिक और चंचल हिस्सों को ऊर्जा देती हैं। हालांकि इतने बड़े कलाकार समूह में सभी किरदारों को बराबर विस्तार नहीं मिल पाता।
निर्देशन: भव्यता और मनोरंजन पर जोर
रमेश सिप्पी की सोच यहाँ बड़े पर्दे के रोमांच पर केंद्रित दिखाई देती है। फिल्म में कॉमेडी, रोमांस, अपराध, पारिवारिक भावनाएँ और एक्शन को साथ रखने की कोशिश है। दृश्य सज्जा और खलनायक की दुनिया इसके खास आकर्षण हैं।
लेकिन यही विस्तार कुछ जगह कमजोरी बनता है। शुरुआती हल्के प्रसंगों से मुख्य संघर्ष तक पहुँचने में समय लगता है। कुछ दृश्य मनोरंजक होने के बावजूद कहानी को बहुत आगे नहीं बढ़ाते। अधिक चुस्त संपादन फिल्म की गति को बेहतर बना सकता था।
फिर भी, जब कहानी शाकाल से सीधे टकराव की ओर बढ़ती है, तो उसका रोमांच अधिक प्रभावी हो जाता है।
आर. डी. बर्मन का संगीत
‘शान’ में आर. डी. बर्मन का संगीत मनोरंजन का बड़ा आधार है। इसके गीतों में ‘यम्मा यम्मा’, ‘जानू मेरी जान’, ‘प्यार करने वाले’ और ‘नाम अब्दुल है मेरा’ शामिल हैं। Gadgets 360
‘यम्मा यम्मा’ अपनी ऊर्जा और लय से माहौल बनाता है। ‘जानू मेरी जान’ में बड़े कलाकार समूह वाली हिंदी फिल्मों की चंचलता महसूस होती है। ‘प्यार करने वाले’ फिल्म के ग्लैमरस अंदाज़ के साथ बैठता है।
संगीत की विशेषता उसकी विविधता है। हर गीत एक ही भाव को दोहराने के बजाय फिल्म की अलग स्थिति को रंग देता है। हालांकि आज के तेज कथानक के अभ्यस्त दर्शक को कुछ गीतों के कारण कहानी में ठहराव महसूस हो सकता है।
एक्शन और क्लाइमैक्स
फिल्म का अंतिम हिस्सा उसके बड़े पैमाने की सोच को सामने लाता है। खलनायक का अड्डा, नायकों की मुश्किलें और खतरे से निकलने की कोशिशें इसे रोमांचक बनाती हैं।
आज के तकनीकी स्तर से देखने पर कुछ प्रभाव पुराने लग सकते हैं। फिर भी उनकी कल्पना और प्रस्तुति में आकर्षण है। यहाँ आनंद हर घटना की वास्तविक संभावना खोजने से अधिक उस सिनेमाई रोमांच में है, जिसे फिल्म रचती है।
फिल्म कहाँ कमजोर पड़ती है?
‘शान’ की सबसे स्पष्ट कमी इसकी लंबाई और असमान गति है। मुख्य कहानी के बीच कुछ प्रसंग फैल जाते हैं। बड़े कलाकार समूह के कारण कुछ संबंधों और सहायक किरदारों को अपेक्षित गहराई नहीं मिलती।
कहीं-कहीं दृश्य प्रभाव भावनाओं से अधिक हावी हो जाता है। दर्शक घटनाओं की भव्यता से प्रभावित होता है, लेकिन हर किरदार के संघर्ष से उतनी निकटता महसूस नहीं कर पाता। यही कारण है कि फिल्म के सबसे यादगार हिस्से अक्सर शाकाल, नायकों की जोड़ी और संगीत से जुड़े दिखाई देते हैं।
क्या आज ‘शान’ देखनी चाहिए?
पुरानी हिंदी फिल्मों के बड़े सितारे, लंबे संगीत दृश्य, स्टाइलिश खलनायक और साहसिक एक्शन पसंद हैं, तो ‘शान’ देखने लायक है। यह उस दौर के लोकप्रिय सिनेमा की महत्वाकांक्षा और मनोरंजन की सोच को समझने का अवसर भी देती है।
तेज रफ्तार और बेहद सघन पटकथा चाहने वाले दर्शकों को कुछ हिस्से धीमे लग सकते हैं। लेकिन अमिताभ–शशि की जोड़ी और शाकाल के साथ होने वाली टक्कर फिल्म को आकर्षक बनाए रखती है।
अंतिम राय और रेटिंग
‘शान’ एक भव्य, संगीत से भरपूर और स्टाइलिश एक्शन फिल्म है। इसकी कहानी हर जगह समान मजबूती नहीं दिखाती, लेकिन कलाकारों का आकर्षण, शाकाल का व्यक्तित्व और रोमांचक दृश्य इसकी कमियों की काफी भरपाई करते हैं।
शान फिल्म रिव्यू इस समीक्षा की रेटिंग: 3.5/5
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