आज की गरुड़ पुराण प्रेरित कहानी मृत्यु के बाद खुला बंद संदूक
गाँव चंदनपुर में सेठ हरिदास नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास अपार धन था, लेकिन उसका हृदय बहुत कठोर था। कोई गरीब सहायता माँगने आता तो वह कहता—
“धन बड़ी मेहनत से मिलता है, इसे बाँटने के लिए नहीं कमाया जाता।”
हरिदास के घर में लोहे का एक बड़ा संदूक था। वह उसे हमेशा बंद रखता और उसकी चाबी अपने गले में पहनता था। परिवार में किसी को नहीं पता था कि संदूक में क्या है।
एक रात अचानक उसकी मृत्यु हो गई। प्राण निकलते ही उसने स्वयं को अपने शरीर के पास खड़ा पाया। वह सबको रोते हुए देख सकता था, लेकिन उसकी आवाज किसी तक नहीं पहुँच रही थी।
तभी दो यमदूत वहाँ प्रकट हुए। हरिदास डरकर बोला—
“मुझे कुछ समय दीजिए। मेरा धन, मेरी दुकान और मेरा संदूक—सब यहीं छूट गया है!”
यमदूत ने उत्तर दिया—
“जो वस्तुएँ पृथ्वी पर कमाई गईं, वे पृथ्वी पर ही रहती हैं। तुम्हारे साथ केवल तुम्हारे कर्म जाएँगे।”
चित्रगुप्त का लेखा गरुड़ पुराण की कहानी
यमलोक पहुँचने पर चित्रगुप्त ने हरिदास के जीवन का लेखा खोला। उसमें लिखा था कि उसने व्यापार में कई लोगों का अधिकार छीना, मजदूरों को कम वेतन दिया और जरूरतमंदों को अपने दरवाजे से खाली लौटाया।
हरिदास घबराकर बोला—
“लेकिन मैंने मंदिर के लिए बहुत सारा सोना संदूक में रखा था! मैं उसे दान करने वाला था।”
चित्रगुप्त ने शांत स्वर में कहा—
“दान करने का विचार पुण्य नहीं बनता। जो शुभ कर्म किया ही नहीं गया, उसका फल कैसे मिलेगा?”
हरिदास की आँखों में पछतावे के आँसू आ गए।
बंद संदूक का रहस्य
अगली सुबह परिवार ने संदूक खोला। उसमें सोना, चाँदी और धन के साथ एक पत्र मिला। पत्र में लिखा था—
“मेरी मृत्यु के बाद इस धन का एक भाग गरीबों और अनाथ बच्चों की सेवा में लगाया जाए।”
लेकिन धन को लेकर परिवार के लोगों में झगड़ा शुरू हो गया। हर व्यक्ति अपना हिस्सा चाहता था। किसी ने भी हरिदास की अंतिम इच्छा पूरी करने की परवाह नहीं की।
दूर खड़ी उसकी आत्मा सब कुछ देख रही थी। वह रोते हुए बोला—
“काश! मैंने जीवित रहते अपने हाथों से दान कर दिया होता।”
यमदूत ने कहा—
“मनुष्य जीवनभर कल के भरोसे पुण्य टालता रहता है, लेकिन मृत्यु कभी कल तक प्रतीक्षा नहीं करती।”
गरीब मजदूर का कर्म
उसी गाँव में रामू नाम का गरीब मजदूर रहता था। उसके पास धन कम था, फिर भी वह अपनी रोटी का एक हिस्सा प्रतिदिन किसी भूखे व्यक्ति या पशु को खिलाता था।
एक दिन किसी ने उससे पूछा—
“तुम्हारे पास अपने लिए ही पर्याप्त नहीं है, फिर भी बाँटते क्यों हो?”
रामू मुस्कराकर बोला—
“मैं धनवान नहीं हूँ, लेकिन किसी को भूखा देखकर भी चुप रहूँ तो मेरा जीवन किस काम का?”
हरिदास की आत्मा ने रामू को देखा और समझ गई कि पुण्य धन की मात्रा से नहीं, बल्कि मन की भावना और किए गए कर्म से बनता है।
कहानी की सीख
धन, घर और संपत्ति मृत्यु के बाद यहीं रह जाते हैं। मनुष्य के साथ केवल उसके अच्छे और बुरे कर्म जाते हैं। इसलिए दान, सेवा, क्षमा और सहायता जैसे शुभ कार्यों को भविष्य के लिए नहीं टालना चाहिए।
जो पुण्य आज किया जा सकता है, उसे कल पर मत छोड़िए—क्योंकि मृत्यु समय बताकर नहीं आती।
नोट: यह गरुड़ पुराण की शिक्षाओं से प्रेरित एक मौलिक कथा है, इसे गरुड़ पुराण का मूल प्रसंग न समझें।
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