झंडू कुमार ने रचा इतिहास, कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को दिलाया पहला पदक
भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में शानदार शुरुआत करते हुए अपना पहला पदक जीत लिया है। पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर पूरे देश को गौरवान्वित किया। यह केवल एक ब्रॉन्ज मेडल नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है।
झंडू कुमार कौन हैं?
बिहार के रहने वाले झंडू कुमार का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। बचपन में पोलियो होने के कारण उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। पिता सब्जियां बेचते थे और झंडू कुमार ने भी परिवार का सहारा बनने के लिए सब्जियां बेचीं और ई-रिक्शा चलाकर अपनी ट्रेनिंग का खर्च उठाया।
कैसे जीता ब्रॉन्ज मेडल?
झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया।
पहला सफल प्रयास – 181 किग्रा
दूसरा सफल प्रयास – 190 किग्रा
तीसरा प्रयास – 196 किग्रा (असफल)
उन्होंने 130.9 अंक हासिल किए और कांस्य पदक अपने नाम किया। इसी के साथ भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पदकों का खाता खुल गया।
बेहद करीब थे सिल्वर मेडल से
झंडू कुमार का प्रदर्शन इतना शानदार था कि वे सिल्वर मेडल से बेहद मामूली अंतर से पीछे रह गए। फिर भी उनका यह प्रदर्शन भारतीय दल के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि उन्होंने प्रतियोगिता का पहला पदक दिलाया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी बधाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर झंडू कुमार को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने भारत का नाम रोशन किया है और उनका यह प्रदर्शन देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
संघर्ष से सफलता तक
झंडू कुमार की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। गरीबी, पोलियो, लोगों के ताने, आर्थिक तंगी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज वही खिलाड़ी कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर भारत का तिरंगा लहरा रहा है।
भारत के लिए बड़ी शुरुआत
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में झंडू कुमार का यह कांस्य पदक भारतीय दल के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित हुआ। इसके बाद मीराबाई चानू ने स्वर्ण पदक और अन्य भारतीय खिलाड़ियों ने भी शानदार प्रदर्शन कर भारत की पदक तालिका को मजबूत किया।
निष्कर्ष
झंडू कुमार ने यह साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियां सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। सब्जियां बेचने और ई-रिक्शा चलाने से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का पहला पदक जीतने तक का उनका सफर हर भारतीय के लिए प्रेरणा है। उनका यह ब्रॉन्ज मेडल आने वाली पीढ़ियों को मेहनत, धैर्य और विश्वास का संदेश देता है।
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